कोलकाता : पश्चिम बंगाल में कांग्रेस पार्टी लगातार संघर्ष कर रही है। पार्टी के वोट बैंक में लगातार कमी हुई है, वहीं पार्टी नेताओं-कार्यकर्ताओं का पार्टी छोड़ कर जाना भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। साथ ही प्रदेश में भाजपा के बढ़ते प्रभाव से परेशान कांग्रेस लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल की राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए कड़ी मशक्कत कर रही है।

आजादी के बाद दो दशक से अधिक समय तक बंगाल पर शासन करने वाली कांग्रेस का प्रभाव समय के साथ कम होता गया और पार्टी अब केवल कुछ इलाकों तक ही सीमित रह गयी है।गुटबाजी से पीड़ित प्रदेश कांग्रेस के लिए एक विश्वसनीय और प्रभावी नेतृत्व की कमी तथा संगठनात्मक अस्थिरता भी एक समस्या है। 2014 के लोकसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल में कांग्रेस नौ प्रतिशत से कुछ अधिक वोट लेकर प्रदेश में चौथे स्थान पर रही थी, जिससे पार्टी की हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है।

कांग्रेस की राज्य समन्वय समिति के प्रमुख और सांसद प्रदीप भट्टाचार्य ने कहा, ‘‘हां, वास्तव में यह लड़ाई बंगाल में हमारे अस्तित्व को साबित करने के लिए है। यह सच है कि हमने पिछले कुछ वर्षों में अपनी ताकत खो दी है, लेकिन हम अभी भी एक मजबूत दल हैं, जिसे खारिज नहीं किया जा सकता।’ पश्चिम बंगाल कांग्रेस के 77 वर्षीय अध्यक्ष सोमेन मित्रा राज्य में पार्टी को पुनर्जीवित करने को लेकर आशान्वित हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में पार्टी की जीत का पश्चिम बंगाल में एक खास असर होगा।

मित्रा ने कहा, ‘‘यह सच है कि बंगाल में हमारी ताकत कम हो गई है, लेकिन मुझे विश्वास है कि इस बार हम न केवल अपनी चार सीटों को बरकरार रखेंगे, बल्कि इनकी संख्या में भी इजाफा करेंगे। मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर जैसे कुछ जिलों में हम एक मजबूत ताकत हैं। हम अपने गढ़ को बनाए रखेंगे।’